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कर्ण पर्व
अध्याय २३
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सञ्जय़ उवाच
यथा शल्य त्वमात्थेदमेवमेतदसंशय़म् |  ४२   क
अभिप्राय़स्तु मे कश्चित्तं निवोध जनेश्वर ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति