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उद्योग पर्व
अध्याय २९
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वासुदेव उवाच
या वै विद्याः साधय़न्तीह कर्म; तासां फलं विद्यते नेतरासाम् |  ६   क
तत्रेह वै दृष्टफलं तु कर्म; पीत्वोदकं शाम्यति तृष्णय़ार्तः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति