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कर्ण पर्व
अध्याय ३४
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सञ्जय़ उवाच
इति व्रुवति राधेय़ं मद्राणामीश्वरे नृप |  १५   क
अभ्यवर्तत वै कर्णं क्रोधदीप्तो वृकोदरः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति