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द्रोण पर्व
अध्याय २९
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सञ्जय़ उवाच
प्रिय़मिन्द्रस्य सततं सखाय़ममितौजसम् |  १   क
हत्वा प्राग्ज्योतिषं पार्थः प्रदक्षिणमवर्तत ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति