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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
एक एव सदा कृष्णो मित्राणामभय़ङ्करः |  ५१   क
रणे सन्त्यजति प्राणान्द्वितीय़स्त्वं च सात्यके ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति