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द्रोण पर्व
अध्याय २९
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सञ्जय़ उवाच
चक्राणि विशिखाः प्रासा विविधान्याय़ुधानि च |  १८   क
प्रपेतुः सर्वतो दिग्भ्यः प्रदिग्भ्यश्चार्जुनं प्रति ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति