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द्रोण पर्व
अध्याय २९
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सञ्जय़ उवाच
हतैर्मनुष्यैस्तुरगैश्च सर्वतः; शराभिवृष्टैर्द्विरदैश्च पातितैः |  ४०   क
तदा श्वगोमाय़ुवडाभिनादितं; विचित्रमाय़ोधशिरो वभूव ह ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति