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कर्ण पर्व
अध्याय २९
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सञ्जय़ उवाच
दिवाकरेणापि समं तपन्तं; समाप्तरश्मिं यशसा ज्वलन्तम् |  १३   क
तमोनुदं मेघ इवातिमात्रो; धनञ्जय़ं छादय़िष्यामि वाणैः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति