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कर्ण पर्व
अध्याय २९
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सञ्जय़ उवाच
अप्रिय़ो यः परुषो निष्ठुरो हि; क्षुद्रः क्षेप्ता क्षमिणश्चाक्षमावान् |  २०   क
हन्यामहं तादृशानां शतानि; क्षमामि त्वां क्षमय़ा कालय़ोगात् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति