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शान्ति पर्व
अध्याय २७७
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सगर उवाच
किं श्रेय़ः परमं व्रह्मन्कृत्वेह सुखमश्नुते |  ३   क
कथं न शोचेन्न क्षुभ्येदेतदिच्छामि वेदितुम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति