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कर्ण पर्व
अध्याय २९
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सञ्जय़ उवाच
अवात्सं वै व्राह्मणच्छद्मनाहं; रामे पुरा दिव्यमस्त्रं चिकीर्षुः |  ४   क
तत्रापि मे देवराजेन विघ्नो; हितार्थिना फल्गुनस्यैव शल्य ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति