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कर्ण पर्व
अध्याय २९
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सञ्जय़ उवाच
इत्येतत्ते मय़ा प्रोक्तं क्षिप्तेनापि सुहृत्तय़ा |  ४०   क
जानामि त्वाधिक्षिपन्तं जोषमास्स्वोत्तरं शृणु ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति