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कर्ण पर्व
अध्याय २९
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सञ्जय़ उवाच
कृतोऽवभेदेन ममोरुमेत्य; प्रविश्य कीटस्य तनुं विरूपाम् |  ५   क
गुरोर्भय़ाच्चापि न चेलिवानहं; तच्चाववुद्धो ददृशे स विप्रः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति