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शल्य पर्व
अध्याय २९
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सञ्जय़ उवाच
ते तं ह्रदं समासाद्य यत्र शेते जनाधिपः |  १०   क
अभ्यभाषन्त दुर्धर्षं राजानं सुप्तमम्भसि ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति