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शल्य पर्व
अध्याय २९
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दुर्योधन उवाच
विश्रम्यैकां निशामद्य भवद्भिः सहितो रणे |  १७   क
प्रतिय़ोत्स्याम्यहं शत्रूञ्श्वो न मेऽस्त्यत्र संशय़ः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति