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सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
प्रजापतिः प्रजाः सृष्ट्वा कर्म तासु विधाय़ च |  १८   क
वर्णे वर्णे समाधत्त एकैकं गुणवत्तरम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति