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शल्य पर्व
अध्याय २९
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सञ्जय़ उवाच
महता शङ्खनादेन रथनेमिस्वनेन च |  ५८   क
उद्धुन्वंश्च महारेणुं कम्पय़ंश्चापि मेदिनीम् ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति