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शल्य पर्व
अध्याय २९
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सञ्जय़ उवाच
ते गत्वा दूरमध्वानं न्यग्रोधं प्रेक्ष्य मारिष |  ६३   क
न्यविशन्त भृशं श्रान्ताश्चिन्तय़न्तो नृपं प्रति ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति