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शल्य पर्व
अध्याय २९
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सञ्जय़ उवाच
इत्येवं चिन्तय़न्तस्ते रथेभ्योऽश्वान्विमुच्य ह |  ६६   क
तत्रासां चक्रिरे राजन्कृपप्रभृतय़ो रथाः ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति