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शान्ति पर्व
अध्याय २९०
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भीष्म उवाच
ज्ञानं महद्यद्धि महत्सु राज; न्वेदेषु साङ्ख्येषु तथैव योगे |  १०३   क
यच्चापि दृष्टं विविधं पुराणं; साङ्ख्यागतं तन्निखिलं नरेन्द्र ||  १०३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति