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द्रोण पर्व
अध्याय १०७
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सञ्जय़ उवाच
ततो विस्फार्य सुमहद्धेमपृष्ठं दुरासदम् |  १७   क
चापं भरतशार्दूलस्त्यक्तात्मा कर्णमभ्ययात् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति