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शान्ति पर्व
अध्याय २९०
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भीष्म उवाच
ज्ञात्वा सत्त्वय़ुतं देहं वृतं षोडशभिर्गुणैः |  २४   क
स्वभावं चेतनां चैव ज्ञात्वा वै देहमाश्रिते ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति