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शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
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याज्ञवल्क्य उवाच
तैलपात्रं यथा पूर्णं कराभ्यां गृह्य पूरुषः |  २२   क
सोपानमारुहेद्भीतस्तर्ज्यमानोऽसिपाणिभिः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति