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उद्योग पर्व
अध्याय १२७
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वैशम्पाय़न उवाच
भीष्मे द्रोणे कृपे कर्णे भीमसेने धनञ्जय़े |  ४८   क
धृष्टद्युम्ने च सङ्क्रुद्धे न स्युः सर्वाः प्रजा ध्रुवम् ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति