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अनुशासन पर्व
अध्याय २२
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स्त्र्यु उवाच
गृहमागम्य विश्रान्तः स्वजनं प्रतिपूज्य च |  १३   क
अभ्यगच्छत तं विप्रं न्याय़तः कुरुनन्दन ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति