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वन पर्व
अध्याय २९०
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वैशम्पाय़न उवाच
अथोद्यन्तं सहस्रांशुं पृथा दीप्तं ददर्श ह |  ४   क
न ततर्प च रूपेण भानोः सन्ध्यागतस्य सा ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति