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वन पर्व
अध्याय २९०
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वैशम्पाय़न उवाच
प्राणानुपस्पृश्य तदा आजुहाव दिवाकरम् |  ७   क
आजगाम ततो राजंस्त्वरमाणो दिवाकरः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति