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शान्ति पर्व
अध्याय २९१
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वसिष्ठ उवाच
कृत्स्नमेतावतस्तात क्षरते व्यक्तसञ्ज्ञकम् |  ३४   क
अहन्यहनि भूतात्मा ततः क्षर इति स्मृतः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति