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अनुशासन पर्व
अध्याय १५३
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः कुन्तीसुतो राजा पौरजानपदं जनम् |  १   क
पूजय़ित्वा यथान्याय़मनुजज्ञे गृहान्प्रति ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति