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शान्ति पर्व
अध्याय २९१
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वसिष्ठ उवाच
सहवासो निवासात्मा नान्योऽहमिति मन्यते |  ४३   क
योऽहं सोऽहमिति ह्युक्त्वा गुणाननु निवर्तते ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति