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वन पर्व
अध्याय २९१
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सूर्य उवाच
नाधर्मश्चरितः कश्चित्त्वय़ा भवति भामिनि |  १४   क
अधर्मं कुत एवाहं चरेय़ं लोककाम्यया ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति