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वन पर्व
अध्याय २९१
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वैशम्पाय़न उवाच
इति स्मोक्ता कुन्तिराजात्मजा सा; विवस्वन्तं याचमाना सलज्जा |  २७   क
तस्मिन्पुण्ये शय़नीय़े पपात; मोहाविष्टा भज्यमाना लतेव ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति