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शान्ति पर्व
अध्याय २९२
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वसिष्ठ उवाच
विविधानि च कृच्छ्राणि सेवते सुखकाङ्क्षय़ा |  १९   क
चान्द्राय़णानि विधिवल्लिङ्गानि विविधानि च ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति