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शान्ति पर्व
अध्याय २९२
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वसिष्ठ उवाच
एवं द्वन्द्वान्यथैतानि वर्तन्ते मम नित्यशः |  ३१   क
ममैवैतानि जाय़न्ते वाधन्ते तानि मामिति ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति