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शान्ति पर्व
अध्याय २९२
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वसिष्ठ उवाच
य एवं वेत्ति वै नित्यं निरात्मात्मगुणैर्वृतः |  ३७   क
तेन देवमनुष्येषु निरय़े चोपपद्यते ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति