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शान्ति पर्व
अध्याय २९२
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वसिष्ठ उवाच
ममत्वेनावृतो नित्यं तत्रैव परिवर्तते |  ३८   क
सर्गकोटिसहस्राणि मरणान्तासु मूर्तिषु ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति