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शान्ति पर्व
अध्याय २९२
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वसिष्ठ उवाच
स लिङ्गान्तरमासाद्य प्राकृतं लिङ्गमव्रणम् |  ४३   क
व्रणद्वाराण्यधिष्ठाय़ कर्माण्यात्मनि मन्यते ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति