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शान्ति पर्व
अध्याय २९२
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वसिष्ठ उवाच
यानि चान्यानि द्वन्द्वानि प्राकृतानि शरीरिषु |  ७   क
उत्पद्यन्ते विचित्राणि तान्येषोऽप्यभिमन्यते |  ७   ख
अभिमन्यत्यभीमानात्तथैव सुकृतान्यपि ||  ७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति