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वन पर्व
अध्याय २९२
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वैशम्पाय़न उवाच
धन्यस्ते पुत्र जनको देवो भानुर्विभावसुः |  १६   क
यस्त्वां द्रक्ष्यति दिव्येन चक्षुषा वाहिनीगतम् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति