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वन पर्व
अध्याय २९२
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वैशम्पाय़न उवाच
को नु स्वप्नस्तय़ा दृष्टो या त्वामादित्यवर्चसम् |  १८   क
दिव्यवर्मसमाय़ुक्तं दिव्यकुण्डलभूषितम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति