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वन पर्व
अध्याय २९२
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वैशम्पाय़न उवाच
धन्या द्रक्ष्यन्ति पुत्र त्वां पुनर्यौवनगे मुखे |  २१   क
हिमवद्वनसम्भूतं सिंहं केसरिणं यथा ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति