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अनुशासन पर्व
अध्याय ६
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भीष्म उवाच
अर्थो वा मित्रवर्गो वा ऐश्वर्यं वा कुलान्वितम् |  १५   क
श्रीश्चापि दुर्लभा भोक्तुं तथैवाकृतकर्मभिः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति