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शान्ति पर्व
अध्याय २९३
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वसिष्ठ उवाच
त्वङ्मांसं रुधिरं मेदः पित्तं मज्जास्थि स्नाय़ु च |  ३५   क
अष्टौ तान्यथ शुक्रेण जानीहि प्राकृतानि वै ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति