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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
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नारद उवाच
न शोचितव्यं राजेन्द्र स्वन्तः स पृथिवीपतिः |  ३८   क
प्राप्तवानग्निसंय़ोगं गान्धारी जननी च ते ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति