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शान्ति पर्व
अध्याय ३०२
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याज्ञवल्क्य उवाच
अव्यक्तसत्त्वसंय़ुक्तो देवलोकमवाप्नुय़ात् |  ७   क
रजःसत्त्वसमाय़ुक्तो मनुष्येषूपपद्यते ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति