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शान्ति पर्व
अध्याय २९३
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वसिष्ठ उवाच
परस्परेणैतदुक्तं क्षराक्षरनिदर्शनम् |  ४७   क
एकत्वमक्षरं प्राहुर्नानात्वं क्षरमुच्यते ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति