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वन पर्व
अध्याय २९३
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं स सूतपुत्रत्वं जगामामितविक्रमः |  १३   क
वसुषेण इति ख्यातो वृष इत्येव च प्रभुः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति