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वन पर्व
अध्याय २९३
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वैशम्पाय़न उवाच
स ज्येष्ठपुत्रः सूतस्य ववृधेऽङ्गेषु वीर्यवान् |  १४   क
चारेण विदितश्चासीत्पृथाय़ा दिव्यवर्मभृत् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति