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वन पर्व
अध्याय २९३
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वैशम्पाय़न उवाच
सूतस्त्वधिरथः पुत्रं विवृद्धं समय़े ततः |  १५   क
दृष्ट्वा प्रस्थापय़ामास पुरं वारणसाह्वय़म् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति