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वन पर्व
अध्याय २९३
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वैशम्पाय़न उवाच
सन्धाय़ धार्तराष्ट्रेण पार्थानां विप्रिय़े स्थितः |  १८   क
योद्धुमाशंसते नित्यं फल्गुनेन महात्मना ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति